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रंगों की मस्ती में न भूलें कानून: ‘नो मींस नो’ का संदेश दे रही होली, वरना जेल की हो सकती है होली

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होली का रंगीन उत्साह जब सड़कों पर उतरता है तो ढोल की थाप और गुलाल की उड़ान के बीच अक्सर एक अहम बात दब जाती है—सहमति। खुशियों के इस पर्व में यदि किसी ने साफ शब्दों में कह दिया कि वह रंग नहीं खेलना चाहता, तो उसका निर्णय अंतिम है। ‘मज़ाक’ के नाम पर जबरन रंग लगाना केवल बदतमीजी नहीं, बल्कि कानून की नजर में अपराध बन सकता है।
त्योहार के दिन पुलिस-प्रशासन अतिरिक्त सतर्क रहता है। किसी भी प्रकार की शिकायत—चाहे वह छेड़छाड़ की हो, अभद्र टिप्पणी की हो या अनुचित स्पर्श की—पर तत्काल एफआईआर दर्ज हो सकती है। महिलाओं और युवतियों के साथ ज़बरदस्ती रंग लगाने या भीड़ का फायदा उठाकर गलत हरकत करने पर सख्त धाराओं में मामला दर्ज होता है। ऐसे मामलों में गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई तय मानी जाती है।
स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। दिल की बीमारी, अस्थमा, हाई ब्लड प्रेशर या स्किन एलर्जी से जूझ रहे लोगों के लिए तेज केमिकल वाले रंग और पानी खतरनाक साबित हो सकते हैं। अगर आपकी जिद से किसी की तबीयत बिगड़ती है तो जिम्मेदारी आप पर आ सकती है। बच्चों के मामले में तो और ज्यादा सावधानी जरूरी है—उनकी आंखें और त्वचा संवेदनशील होती हैं। रंग भरे गुब्बारे या पक्के रंग से चोट लगना आम है। अभिभावकों की अनुमति के बिना बच्चों को रंग लगाना अनुचित माना जाता है।
जानवरों पर रंग डालना भी अपराध की श्रेणी में आता है। कई बार लोग पालतू या आवारा पशुओं को रंगों से सराबोर कर देते हैं, जिससे उनकी त्वचा और आंखों को नुकसान पहुंचता है। पशु क्रूरता के तहत इस पर कार्रवाई संभव है।
ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी, ट्रैफिक स्टाफ, डॉक्टर या अन्य सरकारी कर्मचारी भी ‘होली है’ कहकर छूट नहीं देते। उनके साथ जबरदस्ती करना सरकारी कार्य में बाधा डालने के बराबर है, जो दंडनीय अपराध है।
होली प्रेम और भाईचारे का त्योहार है, दबाव और डर का नहीं। ‘बुरा न मानो, होली है’ की परंपरा तभी तक खूबसूरत है, जब तक सामने वाले की मुस्कान बनी रहे। इस बार होली में रंगों से ज्यादा रिश्तों को बचाइए, और याद रखिए—सहमति ही सबसे बड़ा रंग है।

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